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Durga Amritwani : पढ़ने मात्र से होंगे सब कस्ट सब दूर

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दुर्गा अमृतवाणी | Durga Amritwani :->Durga Amritwani दुर्गा अमृतवाणी | Durga Maa Songs | Bhakti Song | Durga Amritwani Lyrics In Hindi | Mata Ke Bhajan | Bhakti Song | Durga Bhajan | Durga Amrit Dhara

दुर्गा अमृतवाणी | Durga Amritwani

मंगल मय भाव मोहिनी, दुर्गा सुख की खान
जसके चरनो की सुधा, स्वयम पिय भगवन |||

दुःख नाशक संजीवनी, नव दुर्गा का पाथ
जीसस बंटा भिक्षुक कभी, दुनिया का सम्राट
अम्बा दिव्य स्वरूपिणी, का इसो प्रकाश
पृथ्वी जीससे ज्योतिर्मय, उज्जवल है आकाश
दुर्गा परम सनातनी, जग के सृजन हार
आदि भवानी महा देवी, सृष्टि का आधार |||

जय जय दुर्गे माँ …
जय जय दुर्गे माँ … |||

साद मार्ग प्रदक्षिणी, नयन का ये अपदेश
मन से करत जो मनन, उसक काटे कलेश
जो भी विपत्ति काल में, करे री दुर्गा जाप
पूरन हो मन कामना, भगे दुःख संताप
उत्पन्नाकर्ता विश्व की, शक्ति अपरम्पार
इसका अर्चन जो करे, भाव से उतरे पारे
दुर्गा सोक विनाशिनी, ममता का है रूप
सती सती सतवंती, सुख के कल अनूप |||

जय जय दुर्गे माँ …
जय जय दुर्गे माँ … |||

विष्णु ब्रह्मा रुद्र भई, दुर्गा के हैं अधीन
बुद्धी विद्या वर्धनी, सर्व सिद्धि प्रवीण
लाख चौरासी योनियां, से तु मुक्ती दे
महा माया जगदम्बिके, जब भी दया करे
दुर्गा दुर्गति नाशिनी, शिव वाहिनी शुभकार
वेद माता तु गावत्री, सबके पलनहार
सदा सुरक्षित वो जन है, जिस पार माँ का हाथ
विकट डगरिया पे उसकी, कभी ना बिगड़े बात |||

जय जय दुर्गे माँ …
जय जय दुर्गे माँ … |||

महागौरी वरदायिनी, मैया दुःख निदार
शिव दुति ब्रम्हचारिणी, करति जग कल्यान
संकट हरनी भगवती, की तु माला फेर
चिन्ता सकल मिटेगी, घडी लगे न देर
पारस चरन दुर्गा के, झूक झूक माथा टेक
सोना लोहे को करे, अदभुत कोटक देव
भवतारक परमेश्वरी, लीन करे अनंत
इसके वंदन भजन से, पापो का हो अंत |||

Anuradha paudwal Durga amritwani Part 2

दुर्गा माँ दुःख हरने वाली
मंगल मंगल करने वाली
भय के सर्प को मारने वाली
भवनिधि से जग्तारने वाली |||

अत्याचार पाखंड की दमिनी
वेद पुराणों की ये जननी
दैत्य भी अभिमान के मारे
दीन हीन के काज संवारे |||

सर्वकलाओं की ये मालिक
शरणागत धनहीन की पालक
इच्छित वर प्रदान है करती
हर मुश्किल आसान है करती |||

भ्रामरी हो हर भ्रम मिटावे
कण -कण भीतर कजा दिखावे
करे असम्भव को ये सम्भव
धन धन्य और देती वैभव |||

महासिद्धि महायोगिनी माता
महिषासुर की मर्दिनी माता
पूरी करे हर मन की आशा
जग है इसका खेल तमाशा |||

जय दुर्गा जय-जय दमयंती
जीवन- दायिनी ये ही जयन्ती
ये ही सावित्री ये कौमारी
महाविद्या ये पर उपकारी |||

सिद्ध मनोरथ सबके करती
भक्त जनों के संकट हरती
विष को अमृत करती पल में
ये ही तारती पत्थर जल में |||

इसकी करुणा जब है होती
माटी का कण बनता मोती
पतझड़ में ये फूल खिलावे
अंधियारे में जोत जलावे |||

वेदों में वर्णित महिमा इसकी
ऐसी शोभा और है किसकी
ये नारायणी ये ही ज्वाला
जपिए इसके नाम की माला |||

ये है सुखेश्वरी माता
इसका वंदन करे विधाता
पग-पंकज की धूलि चंदन
इसका देव करे अभिनंदन |||

जगदम्बा जगदीश्वरी दुर्गा दयानिधान
इसकी करुणा से बने निर्धन भी धनवान |||

छिन्नमस्ता जब रंग दिखावे
भाग्यहीन के भाग्य जगावे
सिद्धि – दात्री – आदि भवानी
इसको सेवत है ब्रह्मज्ञानी |||

शैल-सुता माँ शक्तिशाला
इसका हर एक खेल निराला
जिस पर होवे अनुग्रह इसका
कभी अमंगल हो ना उसका |||

इसकी दया के पंख लगाकर
अम्बर छूते है कई जाकर
राय को ये ही पर्वत करती
गागर में है सागर भरती |||

इसके कब्जे जग का सब है
शक्ति के बिना शिव भी शव है
शक्ति ही है शिव की माया
शक्ति ने ब्रह्मांड रचाया |||

इस शक्ति का साधक बनना
निष्ठावान उपासक बनना
कुष्मांडा भी नाम इसका
कण – कण में है धाम इसका |||

दुर्गा माँ प्रकाश स्वरूपा
जप-तप ज्ञान तपस्या रूपा
मन में ज्योत जला लो इसकी
साची लगन लगा लो इसकी |||

कालरात्रि ये महामाया
श्रीधर के सिर इसकी छाया
इसकी ममता पावन झुला
इसको ध्यानु भक्त ना भुला |||

इसका चिंतन चिंता हरता
भक्तो के भंडार है भरता
साँसों का सुरमंडल छेड़ो
नवदुर्गा से मुंह न मोड़ो |||

चन्द्रघंटा कात्यानी
महादयालू महाशिवानी
इसकी भक्ति कष्ट निवारे
भवसिंधु से पार उतारे |||

अगम अनंत अगोचर मैया
शीतल मधुकर इसकी छैया
सृष्टि का है मूल भवानी
इसे कभी न भूलो प्राणी |||

दुर्गा की कर साधना, मन में रख विश्वास
जो मांगोगे पाओगे क्या नहीं मेरी माँ के पास |||

खड्ग – धारिणी हो जब आई
काल रूप महा-काली कहाई
शुम्भ निशुम्भ को मार गिराया
देवों को भय-मुक्त बनाया |||

अग्निशिखा से हुई सुशोभित
सूरज की भाँती प्रकाशित
युद्ध-भूमि में कला दिखाई
मानव बोले त्राहि-त्राहि |||

करे जो इसका जाप निरंतर
चले ना उस पर टोना मंत्र
शुभ-अशुभ सब इसकी माया
किसी ने इसका पार ना पाया |||

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