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राजेंद्र दास जी महाराज | Rajendra das ji maharaj

राजेंद्र दास जी महाराज | Rajendra das ji maharaj | rajendra das ji | :->बुन्देलखंड के एक बहुत ही जानेमाने संत हैं। उनका नाम है सुनील राजन दास देवा Rajendra das ji । तो आज हम उनके जीवन परिचय Rajendra das ji maharaj biographyके बारे में चर्चा करेंगे, |,

shri rajendra das ji maharaj तो वैसे तो आपने कथावाचकों को या फिर पीठाधीश्वरों के नाम से सुना होगा | जो अपने साथ लिखी बातें आपको सरल भाषा में बताने का प्रयास करते हैं। लेकिन Rajendra das ji maharaj राजेंद्र दास जी एक जाने-माने  कथावाचक अवगुण सेवा के नाम से भी जाने जाते हैं

राजेंद्र दास जी महाराज | Rajendra das ji maharaj

स्वामी जी के अनुसार आने वाली पीढ़ी को गौ सेवा का जिम्मा उठाना चाहिए उनके मुताबिक गौ सेवा ही भगवान को पाने का सरल उपाय है उनके मुताबिक यह भी है गौशाला का संचालन बहुत ही सही ढंग से पुन  चाहिए|जिसमें गोवंश का अच्छा पैसा मदन हुआ जो बहुत ही प्रशंसनीय है।

इस बात को महान सिद्ध संत पूजनीय जी देवराहा बाबा जी ने तीर्थराज प्रयाग में महाकुम्भ, क्या सभा सन् 1889 में विश्व हिन्दू परिषद के मंच से कहा था कि देव भूमि बहुत ही समृद्धि के लिए गोसेवा वाचा की आवश्यक है।

Rajendra das ji maharaj biograpghy


तो saint shree Rajendra das ji का जन्म मध्य प्रदेश राज्य के टीकमगढ़ जिले में स्थित अजंदा नामक गांव में हुआ था। प्राचीन समय से ही अजंता विद्वानों आचार्यों वैदिक ब्राह्मणों का घर द्वार स्वामी ही राजन जी का जन्म भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की पंचमी राजा ऋषि पंचमी के दिन हुआ था।

swami Rajendra das ji के पिता का नाम पंडित जी रामचरण जी पाण्डेय है जो बहुत ही गुणी, पवित्र धार्मिक व संत भक्ति जोशी, भक्तमाल के साहसी ाम कठिन कथा की समझ का सच्चा सहज प्रवचन दिया करते थे।

राजन दास जी की पूज्य माता जी का नाम श्रीमती बेल लता देवी है। आयंगार जी के माता पिता ने मंडावल के रसिक संत आदरणीय अनंत से विभूषित श्रीगणेश दास जी महाराज से वैष्णो दीक्षा ताप्ती में मानकर लेटे, नालंदा जी की शिक्षा की दलाली नाथ जी बचपन में श्रीधाम वृंदावन में हुई शादी के पार्टियों में सदगुरु श्री भक्तमाली जी महाराज का सानिध्य प्राप्त हुआ।

उसी समय से भक्तमाली जी महाराज ने सुदामा को वनवास काटने से बा कमाल का अपना महान भाष्य लिखा था। उन्होंने अपने नये युवा लालचन्द को अपने शानदार वैष्णव परम्परा में शामिल किया जाए।

रूप से राजनैतिक चेंज के साथ शिक्षा का प्रारम्भ हुआ और इस नये दीपचंद का नाम रखा गया। लालन दास, सुसंस्कृत वैष्णव छात्र राजन दास ने संस्कृत व्याकरण, बच्चे सुंदर मेदान्ता साहेब का कमा कर धन या मास्टर डिग्री प्राप्त की।

नारायणदास ने 8 जनवरी 2 हज़ार 18 को जगदगुरु रामानंदाचार्य की जयंती पर श्री तुलसी पीठाधीश्वर तिब्बिया विश्विद्यालय से माननीय राष्ट्रपति महोदय के हाथों से डीलिट की मानद उपाधि प्राप्त की।

राजेंद्र दास जी महाराज के गुरु कोन थे|Rajendra das ji maharaj ke guru

अब बात आती है राजन राजू की गुरु की तो Rajendra das ji के गुरु पूज्य गुरुदेव नन्द से सम्बन्ध श्री गणेश दास जी भक्तमाली जी महराज। इनका जन्म नैमिषारण्य के पवित्र धरा पर सीतापुर जनपद के अंतर्गत गोमती गंगा के तट पर बसे कोसी गांव में दास चबूतरे और कुबेर मैं अपने कुल में पंडित लक्ष्मण प्रसाद एवं श्रीमती कैलाशी देवी की ग्रह में सन 19 118 में हुआ।

राजेंद्र महाराज की आध्यात्मिक यात्रा | Rajendra das ji maharaj ki adhiatmik yatra

जिनका नाम बचपन में सेठ भैया प्रसाद त्रिपाठी के रूप में किया गया। उसके बाद राजन दास जी की आध्यात्मिक कितनी यात्रा के बारे में थोड़ी चर्चा कर लेते हैं तो महाराज जी बचपन से ही वाटिका साहब और विलक्षण प्रतिभा के धनी थे।

लेकिन बचपन में वे स्कूल जाने से मना कर देते थे। उनके स्वभाव से उनके माता पिता बहुत चिंतित हैं। बचा रहे नहीं बेटा राजन को कैसे चलाया लेकिन राजन राजीव राज को बचपन से अपने हाथों से बेटियों रूचि थी।

इनको माता पिता पहचान बनाना चाहिए ने भेज दिया। आजीविका नारायण दास को महान संत योगी राज सिद्ध देवदास जी महाराज पूज्यपाद, स्वामी शरणानंद जी महाराज, स्वामी करपात्री जी महाराज जैसी महान विभूतियों का सानिध्य प्राप्त रहा और उनका जीवन मिलता रहा। एनएच 12 जी का दिल में यात्रा की शुरुआत होती है|

और एक दिन महाराज जी संत से मनोज भूटानी साहब बन जाते हैं तो यह बात दो हज़ार की घटनाओं पूज्य बढ़े। महाराज जी ने वर्तमान पर हस्त बंधवा टिप्पणी सबसे पहले लिखी थी। उसके पिता रामदास जी को उन्होंने महेश ने दो बार अपने हाथों से दी जाये। नंदा जी बोले मामाजी उस पर आप अपना बच्चा जवाब भी दे। दो माझी ने लिखा तब राजन दास जी बोले कि महाराज जी|


मैं मनोज पीठाधीश्वर नहीं हूं। मैं तो अपना सब कुछ छोड़ रहा। मनों बिठाया गया। मुझे किसी ने मलूकपीठाधीश्वर टोड़ी बनाया। नाई ना मानें तो तब माझी बोले कि पंडित जी लिखकर काटने की बाबा बड़ा या नहीं। अब हमने राम जी की प्रेरणा से नियत किया है तो काटेंगे नहीं। इसके बारे में किसी ने कहा भी नहीं पर पाण्डु मसलन के वार से लोग अपने आप ही आए ना जी वो मलूकपीठाधीश्वर कहने लगे |

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ऐसे संतो को हम भी श्रद्धा पूर्वक उनके श्री चरणों में प्रणाम करते हैं और आशा करते हैं कि अपनी विशिष्ट सब पर बनाए रखें| क्योंकि मित्रों उज्जैन में सबसे अनमोल हीरा है जाना संतों की सानिध्य प्राप्त करना ही है|

इनके बारे में लिखना है जो बोलना भी कृपा से ही संभव होता है सच्चे संत को पाना भगवान को पाने के बराबर होता है| संत ही मनुष्य को भगवान से मिलाते हैं तो उनका दर्जा तो भगवान से से भी ऊपर हुआ| आप सभी प्रणाम करते हैं और इस पोस्ट को शेयर करें लाइक करें और इस पर प्रणाम करें कमेंट में |

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