सनातन धर्म क्या है | Snatan Dharm kya hai :->सुंदर में हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि धर्म क्या है जो धारण करने योग्य हो एक होता धर्म और एक होता है रिलीजन।दोनों एक जैसे अर्थ प्रकाशित नहीं करते। अंग्रेजी में रिलीजन शब्द का अर्थ लिया गया है। ” system of faith” धर्म शब्द का अर्थ होता है स्वभाव। जो जिसका स्वभाव है वही उसका धर्म है।
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सनातन धर्म क्या है | Snatan Dharm kya hai|Hindu Dharm kise kehta hai| what is Hindu(snatan) dharm
तंबू प्रकार के होते हैं। नैमित्तिक धर्म और नित्य धर्म। इसी प्रकार जीवन के दो प्रकार के धर्म देखे जाते हैं। नैमित्तिक और नित्य। कि तू कभी समझने से पहले यह जानना आवश्यक है कि स्वयं की रूप क्या है? जब स्वरूप का ज्ञान होगा तभी समझ में आ सकता है कि जीव का कौन सा धर्म नैतिक है और कौन सा धर्म नित्य है? अब विचार किया जाए कि जीव कौन है? सुधारण था हम शरीर को ही व्यक्ति समझते हैं। लेकिन फिर व्यक्ति नहीं है। हम लोग कहते हैं – मेरे पर मेरा मन मेरी मेरी इत्यादि।
जबकि मैं शरीर में मन ऐसा कोई नहीं कहता। इससे ए ज्ञान होता है कि मैं बोलने वाला इस शरीर से अलग है। और यह अलग है। जब तक शरीर में चेतना रहती है। अभी तक उसे व्यक्ति कहा जाता है।
चेतना के चले जाने पर सरूपी शरीर को कोई व्यक्ति नहीं कहता। इसलिए मुर्दा शरीर को जलाने से कोई डर नहीं मिलता। शरीर में जब चेतना है जिससे आत्मा कहते हैं उसे ही व्यक्ति कहा जाता है। शरीर को नहीं।
जिस सत्ता के रहने से मैं मैं हूं और जिस सत्ता के ना रहने पर मैं नहीं हूं। रात में आत्मा हूं। आत्मा नित्य है श्री सत्य है। उज्जीवन के रूप के विषयों में यह विचार किया जाए कि जी आत्मा कहां से आई है और इसका धर्म क्या है? भगवान का अंश नहीं है यह उनकी शक्ति का एक अंश मात्र है। उस परमपिता की अनगिनत शक्तियां है।
उनमें से दो शक्तियां परा तथा अपरा के विषय में बताया गया है। पराशक्ति जीव आत्मा है। और अपरा शक्ति है फूल और सूक्ष्म शरीर। अगर हम जी को भगवान मारेंगे तो भगवान के प्रति गलत धारणा होगी। जीब भगवान की शक्ति का एक छोटा सा अंश है भगवान नहीं। इसलिए भगवान और भगवान की शक्ति नित्य। है। और शक्ति का अंश जीव भी नित्य है|
इसी धर्म को कहते हैं सनातन धर्म। सनातन का अर्थ होता है जो पहले भी था अभी भी है और आज और कल के पश्चात भी रहेगा। दूसरी सुनाते नहीं है क्योंकि शरीर नाशवान है?
सनातन का क्या अर्थ है?(What is snatan Dharm?)
जोशी एवं ईश्वर को अनादि अनंत और सनातन मानते हैं। जो लोग यह मानते हैं कि उनके धर्म शिक्षा उपदेशों और अवतारों का कोई अंत नहीं है। अरे सनातनी कहलाए। भगवान के विष्णु श्री राम या श्री कृष्ण के अवतरित होने से पहले सनातन धर्म विद्यमान था। अर्थात सनातन धर्म का अर्थ है जिसका आदि व अंत नहीं।
सनातनी किसे कहते हैं (Snatani kise kehta hai )
प्राचीन संस्कारों को मन वचन कर्म से मारने वाले को सनातनी कहते हैं। और जो सदा सर्वदा ने बेकार रूप में स्थित रहता है उसे सनातन कहते हैं। श्रीमद्भागवत गीता में वर्णित जीव विज्ञान न्यायिक का प्रमाण गुरु पृथ्वी अग्नि तेज वायु आदि पदार्थ सांचौर और सनातन की श्रेणी में आते हैं।
निष्कर्ष:-
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