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महामाया देवी मंदिर रतनपुर|Mahamaya Devi Temple Ratanpur

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महामाया देवी मंदिर रतनपुर|Mahamaya Devi Temple Ratanpur :-> लगभग 1000 वर्ष प्राचीन महामाया देवी का दिव्य मंदिर दर्शनीय है| इसका निर्माण राजा रतन देव प्रथम द्वारा 11वीं शताब्दी में कराया गया था|1045 ई : में राजा रतन देव प्रथम मणिपुर नामक गांव में शिकार के लिए आए थे

महामाया देवी मंदिर रतनपुर|Mahamaya Devi Temple Ratanpur

यहां रात्रि विश्राम उन्होंने एक वटवृक्ष पर किया |अर्धरात्रि में जब राजा की आंखें खुली तब वटवृक्ष के नीचे अलौकिक प्रकाश के आवरण के मध्य वह यह देखकर चमत्कृत होगे कि वहां आदिशक्ति महामाया देवी की सवा लगी हुई है।

यह देखकर वह अपनी चेतना खो बैठे |सुबह होने पर वह अपनी राजधानी तुम्माण खोल लौट आए और रतनपुर को अपनी राजधानी बनाने का निर्णय लिया तथा 1050 ई: में श्री महामाया देवी का भव्य मंदिर निर्मित करवाया।


मंदिर के भीतर महाकाली, महासरस्वती और महालक्ष्मी की कलात्मक मूर्तियां विराजमान है| रत्नावली में ही देवी सती का दाया स्कंध गिरा था जो अब रतनपुर के नाम से जाना जाता है |यहां की शक्ति “कुमारी” तथा भैरव “शिव ” है|

यहां के मंदिर में महामाया देवी सिंह वाहिनी दुर्गा के रूप में स्थापित हैं |यह मंदिर राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है।


श्री महामाया मंदिर की सरचना स्थति व धार्मिक अनुष्ठान इसके प्राचीनतम पर सफल होने की ओर संकेत करते हैं |राजा रतन देव ने अर्ध जागृत स्थिति में वर्तमान मंदिर के पास स्थित जिस वटवृक्ष के नीचे जिन अलौकिक देवियों के बीच देवी महामाया की सभा लगी देखी थी वह देवियां 64 योगिनीयों ही रही होंगी तंत्र में इन योगिनीयो की बड़ी महिमा है।


हाल में ही कुछ वर्षों तक महामाया मंदिर आम्रकुंजो से गिरा हुआ था |इस क्षेत्र को मधुबन कहा जाता है | देवी महामाया का वर्तमान मंदिर अपने भीतर कुछ ऐसे विलक्षण संकेत संजोए हुए हैं जो इसके तंत्र सफल होने के सबल प्रमाण है |

Ratanpur mahamaya mandir

मंदिर की संरचना में शक्ति प्रतीकों का यथा भाला व सुधीर कुर्बान का अंकन तथा मंदिर के पाश्व्र में उल्लूको का चित्र कांड उनकी छोटी प्रतिमाएं मंदिर को वैशिषटा प्रदान करती है| रतनपुर नगरी को चारों युग की नगरी कहा जाता है| सतयुग में इसका नाम मणिपुर, तत्रेत्रा में मनीकपूर, द्वापर में हीरापुर और कलयुग में आज रतनपुर (रत्नावली )के नाम से जाना जाता है |

भगवान शिव ने सवय अविभूत होकर उसे कुमारी शक्तिपीठ का नाम दिया था |जिसके कारण मां के दर्शन से कुंवारी कन्याओं को सौभाग्य की प्राप्ति होती है| यह जागृत पीठ है यहां भक्तों की समस्त कामनाएं पूर्ण होती है।


नवरात्र पूर्व पर यहां की छटा दर्शनीय होती है| इस अवसर पर श्रद्धालुओं द्वारा यहां हजारों की संख्या में मनोकामना ज्योति कलश प्रज्ज्वलित किए जाते हैं| महामाया शक्ति पीठ के दर्शन के बाद मार्ग में स्थापित काल भैरव के प्राचीन मंदिर का दर्शन करना अवश्य माना जाता है| दर्शन ना करने पर देवी का दर्शन पूर्ण नहीं माना जाता है।


काल भैरव शंकर जी के ही रूप है 9 फीट ऊंची प्रतिमा काल भैरव भयंकर रूप लिए विराजमान है| काल भैरव का वाहन सवार श्री स्थापित है |सभी भकत देवी दर्शन के पश्चात यहां आकर अवश्य दर्शन करते हैं |प्रतिवर्ष 10 -11 लाख श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं।

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