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श्री बज्रेश्वरी देवी शक्तिपीठ का इतिहास

  • Panchang
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श्री बज्रेश्वरी देवी शक्तिपीठ का इतिहास :–>हिमाचल प्रदेश के उन नगर से 125 किलोमीटर एवं ज्वालाजी से लगभग यह 30 किमी. की दुरी पर यह शक्तिपीठ स्तिथ है | देवी स्थान पर पोंछने के लिए सभी स्थानों से बस मिल जाती है | यहाँ | मंदिर का विशाल भवन है सुनहरे कलश इसकी सुंदरता को बड़ा रहे है |

इस मंदिर में महावीर,शिवजी भैरो ,शिवजी ,धानु भगत और सूंदर मुर्तिया बानी हुई है यह श्री तारा देवी का स्थान है कहा जाता है इस स्थान पर माता सती के वक्ष स्थल गिरे थे|

श्री बज्रेश्वरी देवी शक्तिपीठ का इतिहास

इतिहास के अनुसार :-

काँगड़ा का पुराना नाम सुशर्मापुर था जो राजा सुशर्मा के नाम से पड़ा था | इसका संदर्व महाभारत से मिलता है ऐसे जालन्धर पीठ भी कहा जाता है क्योकि जालन्धर शिवालिक की पहाड़ियों से लेकर 12 योजन के क्षेत्र में फैला हुआ है |इस परक्रिमा में ही 64 तीर्थ और अनेक मंदिर स्थापित है |

इतिहास साक्षी है की यह सभी मंदिर सोने चांदी और धन से भरपूर है |यह मंदिर सदैव धन धन्य से परिपूर्ण एवं वैभवशाली रहा है |1009 में मेहमूद गज़नबी ने मंदिर में से अरबो के हीरे जवाहरात और सोना चांदी की लूट की | वर्ष 1337 में मेहमूद तुगलक और 1363-८६ के कश्मीर के राजा गेहबुदीन ने लूटपाट की थी |

फिर 15 शताब्दी में राजा संसारचंद ने इस मंदिर पुर्ननिर्माण किया फिर संन 1540 में शेरशाह सूरी के सेनापति खबास खान ने यहाँ लूटमार की | अकबर ने भी टोडरमल के साथ इस मंदिर की यात्रा की थी जो आइनी अकबरी में दर्ज है |

माता भेंट का चढ़ाना :-

1809 में महाराजा रणजीत सिंह ने यहाँ पर सोने का छत्र चढ़ाया था |अंग्रेजी शाषक कनिगम और लड़ी एरबिन ने मंदिर को कई भेंटे दी |वर्तमान काल में में प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपाई मुख्यमंत्री प्रेम कुमार ,अनेक मंत्री ,राजयपाल .जज संसद एवं विधायक पुधर चुके |

महाराजा रणजीत सिंह के समय गवर्नर जनरल सरदार देसा सिंह मजीठिया ने इस मंदिर को काँगड़ा शैली और सिख परम्परा के अनुसार बनबाया | रानी चाँद कौर ने इसके गुबंद पर सोना लगवाया |

4 अप्रैल , 1905 ईस्वी को देवी भूचाल से मंदिर फिर ख़तम हो गया और वर्तमान मंदिर का भवन सन्न 1920 में पन: बनबाया गया |

मंदिर का भव्य धृष:-

काँगड़ा पोहंचते हे मंदिर के भव्य कलश दूर से ही द्रिष्टिगोचर होने लगते है। श्री माता बृजेश्वरी देवी सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश ही कुल देवी है। तदापि पुरे भारत वर्ष के कोने जाने से भक्तजन माता के दर्शन को आते है। इस माता के मंदिर तक जाने के लिया लम्बी कतार है। जिसके दोनों और बजार लगा हुआ है।

मंदिर के सिंह द्वार से प्रवेश करके यात्री प्रांगण में पोछंते है। यहाँ से भव्य मंदिर की ऊचाई आकाश को छूती प्रतीत होते लगती है । देवी माँ के दर्शन साक्षात पिंडी के रूप में होते है यहाँ पर नियमपूर्वक माता का हार ,सिंगार एवं आरती की जाती है ।

पुराणिक चलती आ रही परंपरा :-

इस स्थान की विशेष महिमा है जब सतयुग में दानवो का वध करके श्री बृजेश्वरी देवी ने विजय प्राप्त की थी। तब सभी देवी देवताओ ने माता की अनेकानेक स्तुति की थी। उस समय मकर संक्रांति का पर्व था। जहाँ जहाँ देवी शरीर पे घाव था वहां वहां देवता ने मिलकर घीका लैप
किया था।


इसे परंपरा मानते हुआ आज भी मकर सक्रांति को माता के ऊपर 14 कीविंटल मखन,इस सो बार शीतल कुँए के जल में धोकर , मेवा तथा अनेक प्रकार से फलो से सुसज्जित करके ,एक सप्ताह तक पिंडी के ऊपर मला जाता है। जो बाद में प्रसाद के रूप में बितरित किया जाता है।इस मखन से चर्म रोग दूर होते है।

अस्स पास के मंदिर :-

मंदिर के आसपास कृपालेश्बर महादेव मंदिर , कुरुछेत्र कुंड। बाबा वीरभद्र मंदिर ,गुप्तगंगा ,अक्षरमाता, चक्रकुंड अदि के दर्शन भी अवश्य करना चाहिए।

मार्ग परिचय :-

चामुंडा 25 ,बैजनाथ धाम 57 ,धर्मशाल 40 किमी दूर है। निकटस्थ रेलवे स्टेशन उन एवं पठानकोट है।

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