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ध्यानू भक्त की अद्भुत कथा

ध्यानू भक्त की अद्भुत कथा :->मुगल सम्राट अकबर के शासन काल में   नादौन ग्राम का निवासी ध्यानु भगत माता के दर्शन की अभिलाषा से अन्य यात्रियों के साथ जा रहा था| हजारों की संख्या में देवी दर्शन को जा रहे यात्रियों को देखकर अकबर के    सिपाहियों के मन में यह इच्छा उत्पन्न हुई कि आखिर इतना बड़ा दल कहां और क्यों जा रहा है ऐसा विचार करके सपाइयों ने उन्हें रोक लिया और सम्राट अकबर के सम्मुख पेश किया|

ध्यानू भक्त की अद्भुत कथा

 बादशाह ने पूछा:-

 कि तुम इतनी आदमियों को लेकर कहां जा रहे हो सच्चाई बयान करो अन्यथा हम तुम्हारा सिर कटवा देंगे |ध्यानु ने कहा–महाराज हम सभी ज्वालामुखी के दर्शन के लिए जा रहे हैं तब अकबर ने पुण्य पूछा यह ज्वालामुखी कौन है हमने तो कभी नहीं देखा फिर वहां जाने का मकसद क्या है क्यों जा रहे हो तुम लोग|


 सम्राट अकबर का प्रश्न सुनकर ध्यानू कितने बड़े शब्द एवं संतुलित ढंग से उत्तर देते हुए कहा माता ज्वालामुखी समस्त संसार की सूजन हार उत्पन्न करने वाली है एवं पालन करने वाली है जो भक्त मैया के दरबार में पहुंचकर सच्चे मन से पूजा एवं प्रार्थना करता है माता उस प्राणी की झोली संसार के सभी सुखों से भर देती है इतना ही नहीं सकते तो यह है|


 कि कोई भी संसारी प्राणी मैया के समस्त गुणों का बखान नहीं कर सकता उनके प्रताप से बिना तेल एवं बिना बत्ती के अखंड ज्योति निरंतर जलती रहती है|

 ध्यानु के वचन सुनकर सम्राट अकबर को महान आश्चर्य हुआ किंतु उसकी बातों का विश्वास ना हुआ तब उन्होंने है  कहां?  तुम्हारी देवी माता सचमुच दिव्य गुणों से युक्त है तो कोई ऐसा कार्य करो जिससे हम तुम्हारे देवी माता पर विश्वास हो आखिर तुम उनके भक्त हो तब ध्यान ने कहा महाराज मैं तो माता का एक तुच्छ सेवक हूं चमत्कार दिखाने की समर्थ है |

 
मुझ में कहा उस समय सम्राट अकबर ने ध्यानू की बातों पर ध्यान ना दे कर उपहास करने की भावना से कार्य भी तुम्हारी बंदगी पूर्ण रूप से पार्क है और तू माता के सच्चे भक्त हो तो तुम्हारी देवी तुम्हारे माता अवश्य और तुम्हारा ध्यान रखेगी|


 तुम यह ध्यानू कि आज तुम्हारी भक्ति और तुम्हारी देवी माता की शक्ति का इम्तिहान है यह कहकर सम्राट अकबर ने एक घोड़े की गर्दन तलवार से काट कर अलग कर दी तत्पश्चात उसने कहा मैंने इस घोड़े की गर्दन काट दी है यदि तुम्हारी देवी शक्ति संपन्न है तो इस बूढ़े को पुण्य जिंदा कर दें|

 देवी का ध्यान करते सम्राट को ध्यानु भगत ने कहा(ध्यानू भक्त की अद्भुत कथा):-

हे महाराज यह धरती में मैया का एक दूज सेवक हूं फिर भी आप नहीं मान रहे हैं तो मेरी आपसे यही विनती है कि आप मुझे एक माह का समय दें और तब तक उस अमृत घोड़े का सिर एवं धन सुरक्षित रखें यह कहकर उसने बादशाह से विदा ली और अन्य यात्रियों से चलकर माता ज्वाला जी के दरबार में जा पहुंचा।


 प्रात काल स्नानादि से निवृत्त होकर मैया की प्रात कालीन की आरती के समय दरबार में उपस्थित होकर हाथ जोड़ नेत्रों को बंद करके पूर्ण श्रद्धा से निवेदन करते हुए कहने लगा हे माता आप तो अंतर्यामी हैं संसार की समस्त वस्तुएं आपके दिव्य दृष्टि के सम्मुख हैं  |


आप चर अचर सजीव निर्जीव में विराजमान हैं हे मातेश्वरी आपने सदैव भक्तों की लाज रखी है और समय पर उपस्थित हुई है हे जग की माता आज तुम्हारी इस भक्तों की लाज तुम्हारे हाथों में है बादशाह अकबर मेरी भक्ति की परीक्षा ले रहा है|


 मां हे माता इस गोरे को पुनर्जीवित करके मेरी भक्ति की रक्षा करो मां यदि आपने मेरी प्रार्थना स्वीकार नहीं की तो मैं  अपना शीश काट कर तुम्हारे चरणों में रख दूंगा। 


यह कहकर ध्यानु ने कुछ पल तक देवी के चमत्कार की प्रतीक्षा की किंतु कोई उत्तर ना मिला तब उसने अपने हृदय से विचार किया कि लज्जित होकर जीने से अच्छा है तो मर जाना है तत्पश्चात उसने तलवार उठा कर अपना शीश काटकर देवी के चरणों में रख दिया|

 ध्यानु भगत ने कहा:-

 उसी समय देवी साक्षात प्रकट हुई और उसकी अमृत में ही दृष्टि पढ़ते ही जानू का कटा हुआ सिर स्वयमेव उसके घर से जुड़ गया तथा वह जीवित हो गया जीवित होने के उपरांत जानू ने देखा देवी मैया चैप्टर उसके सम्मुख अपने दिव्य रूप में उपस्थित है |

या देकर उसके प्रसंता की सीमा न रही तब उसने हाथ जोड़कर देवी के सम्मुख सिर झुकाते हुए कहे माता आप तो अंतर्यामी है सब कुछ जानती है मेरे हृदय की व्यथा से भरी प्रकार पर स्थित है   ध्यानु  के वचनों को सुनकर देवी  ने प्रसन्न होकर कहा।


 भक्त तेरी भक्ति से मैं अत्यंत प्रसन्न हूं। अतः समस्त चिंताओं को त्याग कर जो इच्छा हो मांगो अब तुम्हें बादशाह अकबर के सम्मुख लज्जित नहीं होना पड़ेगा मेरी कृपा से अकबर के दरबार में मृत घोड़े का सिर उसके धड़ से जुड़ चुका है और वे जीवित हो गया है अपनी इच्छा पूर्ति के लिए तुम जो भी जाते हो निर्भय होकर मांगो देवी के बराबर कहने पर  ध्यानु भगत ने कहा है सर्वशक्तिमान माता हे जगत माता के दर्शन मात्र से मेरे समस्त अभिलाषा पूर्ण हो गई हैं| 


 फिर भी आप कहती हैं तो मेरा आपसे यही निवेदन है कि भक्तों की इतनी कठिन परीक्षा ना दिया करें मत सांसारिक प्राणी इतनी कठिन परीक्षा नहीं दे सकते आधा भक्तों पर कृपा करें और साधारण भेंटो से ही उनकी अभिलाषा पूर्ण करें| 


 देवी प्रसन्न होकर बोली:

ध्यानु की वाणी सुनकर मां प्रसन्न हुई और कहा  अपना आवे हाथ उठाकर उसके मस्तक पर फिर कर तथास्तु कहकर बोली है भारत अब जो पर कोई प्राणी मेरे दरबार में उपस्थित होकर मेरे स्वरूप का ध्यान करेगा मैं उस पर प्रसन्न हूं|

कर उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करूंगी तथा इसके स्थान पर नारियल की भेंट स्वीकार करूंगी यह कहकर देवी अंतर्ध्यान हो गई इधर यह घटना घटी उधर दिल्ली बादशाह अकबर के दरबार में घोड़े का कटा सिर धड़ से जुड़ गया| 


 यह दृश्य देखकर बादशाह अकबर सहित उसके समस्त रबारी आश्चर्यचकित रह गए|  तत्पश्चात अकबर ने अपने  कुछ सैनिकों को ज्वालाजी भेजा सैनिकों ने आकर सूचना दी कि वहां जमीन से आग की लपटें ज्वाला रूप में निरंतर निकल रही है| 


 अगर आप आदेश दें तो उन निकलती लपटों को बंद करवा दें जिससे हिंदुओं के पूजा का स्थान ही समाप्त हो जाएगा सैनिकों की बात सुनकर बादशाह अकबर ने विचार किया कि यह सैनिक ठीक कह रहे हैं जब ज्वाला ही निकल नहीं बंद हो जाएगी तो पूजा स्थल ही कहां रहेगा उसने उसी समय आदेश दिया | 

 बादशाह अकबर ने जवानों को ढकने का दिया आदेश:- 

 हे माता के भक्तों बादशाह अकबर का आदेश पाते ही उसके हजारों सैनिक उसी समय ज्वाला को बंद करने अनेक सामान लेकर वहां जा पहुंचे मोटे-मोटे विशाल लोहे के तवे यह सर्वप्रथम उन सभी ने  निकलती जवानों को बंद करने का प्रयास किया किंतु महान आश्चर्य की उन सबों को फाड़कर  ज्वाला बाहर निकलने लगी | 


तब उन सैनिकों ने एक नहर का भाव उस ओर मोड़ दिया उस नहर का पानी लगातार उस ज्योति पर गिरने से ज्योति का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा ऐसा उनका विचार था किंतु विचार विचार ही सिद्ध ना हुआ|


 नहर के पानी से भी उस दिव्य ज्वाला का कुछ ना हुआ वह पूर्व की भांति निकलती रही अंततः वह सभी सैनिक निराश हो गए और कुछ सैनिकों को भेजकर बादशाह अकबर को सूचित किया कि हमारी सारी कोशिश निरर्थक सिद्ध हुआ था अब आप जो उचित समझे वही करें|

 

अकबर ने अनेक ब्राह्मणों को बुलाकर पूछा :-

 तब बादशाह ने विद्वान ब्राह्मणों को बुलाकर विचार विमर्श किया कि मुझे क्या करना चाहिए ब्राह्मणों ने कहा है महाराज अब यही उचित है कि आप स्वयं देवी के दरबार में जाएं और देवी का चमत्कार देखें तथा नियमानुसार देवी को भेंट आदि चढ़ाकर प्रसन्न करें | 


बादशाह अकबर ने ब्राह्मणों की राय मानकर सभा मंच सोने का छत्र बनवा कर उसी क्षण माता ज्वाला जी के दरबार में जा पहुंचे | 


फिर वह छात्र अपने कंधे पर उठाकर चिढ़ाने के लिए चले जब कंधे से उतरकर चढ़ाने लगे उसी समय वह छत्र गिरकर टूट गया और कहा जाता है|  कि वह सोने का ना रहा बल्कि किसी विचित्र धातु का बन गया है |

जो ना लोहा थाना पीतल थाना तांबा और ना ही शीशा जिससे यह सिद्ध होता है कि माता ज्वाला भगवती को अकबर की भेंट अस्वीकार्य थी इस बात को देखकर बादशाह अकबर घबरा गया और माता के चरणों में शीश झुकाकर क्षमा मांगने लगा हे |


माता हमसे जाने अनजाने में जो भूल हुई है उसे क्षमा करें तत्पश्चात वे दिल्ली लौट आए और अपने राज्य के सभी भाइयों एवं अन्य वाहनों द्वारा द्वारों को आदेश दिया कि ज्वालामुखी के भक्तों के साथ आदर पूर्वक विहार करें अकबर द्वारा चढ़ाया हुआ खंडित   छतर आज भी माता के दरबार में बाई और पड़ा है|कि वह सोने का ना रहा बल्कि किसी विचित्र धातु का बन गया जो ना लोहे था ना पीपल ना तांबा और ना ही शीशा जिससे यह सिद्ध होता है|

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